वृक्ष की दास्तान

काश कोई मेरे दु्ख को समझे
क्या गुनाह मेरा तू बता मुझे
मैंने तो की है तेरी ही सेवा
तू लोकर कुल्हाडी काहे काटे तू मुझे
क्या ::::::::::::
तू चले धूप में जब थककर हो जाता चूर है तब
मेरी ही छाँव में पनाह लेता
फिर काहे काटे तू मुझे
क्या:::::::::::::
मैंने तुझको फल है फूल भी दिये
लकडियाँ वानस्पति औषधियाँ भी दी तुझे मैनें तिझको शीतल वायु जीने का आस्तित्व दिया है
ऐ स्वार्थी इन्सान फिर भी तू मुझको काटे है
क्या::::::::::::::::